जिनालय

मरुधर ज्योति प.पू. श्री मणिप्रभ श्रीजी म.सा. की प्रेरणा से मोहनबाड़ी में श्री ऋषभ जिनप्रासाद का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है l इस मंदिर की नक्काशी रणकपुर एवं देलवारा मंदिर से प्रेरित होकर कराई जा रही है l मंदिर का भव्य प्रांगण, विशाल गुंबद, सफेद संगमरमर पर महीन नक्काशी और बेजोड़ शिल्पकला इसे खास बना रही है l यह मंदिर जयपुर के सर्वश्रेष्ठ मंदिर में से एक होगा l

आर्य देश, आर्य संस्कृति, ऋषि महर्षियों की जन्मभूमि – ऐसे इस भारत देश में गौरव प्रधान राजस्थान और उस राजस्थान की राजधानी, जौहरियों की नगरी कला प्रेमी गुलाबी नगरी – जो देश-विदेश में प्रभावशाली पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है l इस धन्य धरा में हिन्दू-तीर्थ गलता जी की तलहटी में जयपुर-दिल्ली हाइवे पर सुरम्य पहाड़ियों के तलहटी में मनमोहक मोहनबाड़ी का विशाल परिसर जहाँ ढाई सौ (250) वर्ष पुराणी निर्विकारी, नयनाभिराम चित्रों से सुशोभित चित्त- आनंदित आत्मिक शांति के प्रदाता युगादिदेव (इस युग के आदिकर्ता) प्रभु परमात्मा आदिनाथ के वृषभ लंछन सहित दुर्लभ पादुकाएं व वीतरागी मुद्रा की प्रतिमाये है l साथ ही प्रत्यक्ष प्रभावी खरतरगच्छ श्रृंगार जिनकुशलसूरि जी महाराज के चरण कमल विराजमान है l

इसी मुनि स्थल पर प.पू. परमात्म भक्ति श्री जयानंद जी म.सा., प.पू. शालिनी प्रवर्तिनी श्री पुण्य श्रीजी म.सा. आगम ज्योति प.पू. श्री सज्जन श्रीजी म.सा. के समाधी मंदिर के साथ ही प.पू. प्रवर्तिनी महोदया बीसवीं सदी की महान साध्वी, व्याधि में समाधि जैन कोकिला पूज्या श्री विचक्षण श्रीजी म.सा. के अंतिम संस्कार स्थली है l

इतिहास

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या आठ जयपुर आगरा – दिल्ली रोड पर स्थित लगभग 14 बीघा भाग क्षेत्र में फैला मोहनबाड़ी परिसर जैन धर्मावलंबियों के लिए एक पवित्र स्थान है। अरावली पर्वत श्रृंखला की उपत्यकाओं  के मध्य प्रकृति के नैसर्गिक एवं मनमोहक वातावरण में निर्मित 108 फीट ऊंचे इस विशाल, भव्य एवं कलात्मक मंदिर की मूल प्रेरणा जैन साध्वी श्री मणिप्रभ श्रीजी महाराज की रही। वर्ष 1986 के फरवरी माह का कोई दिन था, जब जयपुर के बिरला मंदिर के पास से विहार करते हुए उनके मस्तिष्क में उस मंदिर को देख एक विचार आया कि क्यों न जयपुर में एक ऐसा अद्भुत मंदिर निर्मित करवाया जाए जिसे देखकर आम आदमी के मुख से अनायास ही यह निकल पड़े ‘चलो जैन मंदिर’। इस विचार को उन्होंने उस समय कुछ श्रावकों  के सामने रखा लेकिन गंभीरता से कोई विशेष प्रगति इस दिशा में नहीं हुई।

जयपुर पर्यटन की दृष्टि से दुनिया भर में विख्यात है। भारत के पेरिस के रूप में चर्चित इस गुलाबी शहर में ऐसे ही भव्य मंदिर की कल्पना ने रूप लेना प्रारंभ किया वर्ष 2011 में । साध्वी श्रीजी विहार करते हुए देश के अनेक अंचलों में भ्रमण करती रहीं। मंदिर निर्माण का यह सपना उनके दिल दिमाग में कहीं पूरी तरह से बस गया था।  जब उनका  जयपुर आना हुआ तब उन्होंने प्रख्यात रत्न व्यवसायी श्री विमल चंद जी सुराना को मंदिर के लिए भूमि पूजन, शिला स्थापना, मूल गंभारा व मूर्ति विराजमान करने की प्रेरणा दी। सुराना जी ने तुरंत इस पर अपनी सहमति प्रकट कर दी। उसके बाद भूमि पूजन हुआ वहां शिला रखी गई।

मंदिर निर्माण की दृष्टि से 8 दिसंबर ,2010 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन खनन मुहूर्त था और 31 जनवरी, 2011 को कार्य शुरू किया गया। प्रस्तावित मंदिर स्थल की भूमि समतल नहीं थी। उबड़ खाबड़ जमीन पर इतना विशाल मंदिर स्थापित करना एक चुनौती थी। पूरे मंदिर का लोड खंभों पर लेने के लिए यह आवश्यक था कि इसकी फाउंडेशन बहुत मजबूत हो। लगभग 3 वर्ष तक लगातार कार्य चलता रहा और इस स्थल पर 20 फीट नीचे और 20 फुट ऊंची अर्थात 40 फीट की एक ऐसी मजबूत फाउंडेशन बनाई गई ताकि उस नींव पर यह भव्य और विशाल मंदिर अपनी भव्यता के साथ निर्मित किया जा सके। मंदिर निर्माण में पत्थर व कंक्रीट का ही उपयोग किया गया है। लोहे का प्रयोग सामान्यतः पचास सौ वर्षों में मंदिर की दीवारों को कमजोर कर देता है जबकि पत्थर व कंक्रीट से निर्मित दीवारें हजारों वर्षों तक ज्यों की त्यों ही रहती हैं। भारत के प्राचीन मंदिर एवं अनेक ऐतिहासिक स्मारक इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

कला और वास्तुकला

यह संपूर्ण मंदिर श्री मुकेश कुमार कन्हैया जी सोमपुरा के निर्देशन में निर्मित हो रहा है। सोमपुरा परिवार की पिछली अनेक पीढ़ियां सात आठ शताब्दियों से देश के विभिन्न राज्यों में जैन मंदिरों के निर्माण के साथ समर्पित भाव से जुड़ी रहीं हैं। पाली जिले के रहने वाले सोमपुरा ने प्रस्तावित मंदिर निर्माण के वैशिष्ट्य के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि मंदिर की फाउंडेशन 100×150 फीट के क्षेत्र में फैली हुई है। फाउंडेशन तैयार होने के बाद मंदिर निर्माण का पहला पत्थर 23 अप्रैल, 2016 में लगाया गया। इसका लाभ सुराणा परिवार ने लिया। तदोपरांत संस्थागत एवं जन सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य अनवरत जारी है।

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या आठ जयपुर आगरा – दिल्ली रोड पर स्थित लगभग 14 बीघा भाग क्षेत्र में फैला मोहनबाड़ी परिसर जैन धर्मावलंबियों के लिए एक पवित्र स्थान है। अरावली पर्वत श्रृंखला की उपत्यकाओं के मध्य प्रकृति के नैसर्गिक एवं मनमोहक वातावरण में निर्मित 108 फीट ऊंचे इस विशाल, भव्य एवं कलात्मक मंदिर की मूल प्रेरणा जैन साध्वी श्री मणिप्रभ श्रीजी महाराज की रही। वर्ष 1986 के फरवरी माह का कोई दिन था, जब जयपुर के बिरला मंदिर के पास से विहार करते हुए उनके मस्तिष्क में उस मंदिर को देख एक विचार आया कि क्यों न जयपुर में एक ऐसा अद्भुत मंदिर निर्मित करवाया जाए जिसे देखकर आम आदमी के मुख से अनायास ही यह निकल पड़े ‘चलो जैन मंदिर’। इस विचार को उन्होंने उस समय कुछ श्रावकों के सामने रखा लेकिन गंभीरता से कोई विशेष प्रगति इस दिशा में नहीं हुई।

जयपुर पर्यटन की दृष्टि से दुनिया भर में विख्यात है। भारत के पेरिस के रूप में चर्चित इस गुलाबी शहर में ऐसे ही भव्य मंदिर की कल्पना ने रूप लेना प्रारंभ किया वर्ष 2011 में । साध्वी श्रीजी विहार करते हुए देश के अनेक अंचलों में भ्रमण करती रहीं। मंदिर निर्माण का यह सपना उनके दिल दिमाग में कहीं पूरी तरह से बस गया था। जब उनका जयपुर आना हुआ तब उन्होंने प्रख्यात रत्न व्यवसायी श्री विमल चंद जी सुराना को मंदिर के लिए भूमि पूजन, शिला स्थापना, मूल गंभारा व मूर्ति विराजमान करने की प्रेरणा दी। सुराना जी ने तुरंत इस पर अपनी सहमति प्रकट कर दी। उसके बाद भूमि पूजन हुआ वहां शिला रखी गई।

मंदिर निर्माण की दृष्टि से 8 दिसंबर ,2010 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन खनन मुहूर्त था और 31 जनवरी, 2011 को कार्य शुरू किया गया। प्रस्तावित मंदिर स्थल की भूमि समतल नहीं थी। उबड़ खाबड़ जमीन पर इतना विशाल मंदिर स्थापित करना एक चुनौती थी। पूरे मंदिर का लोड खंभों पर लेने के लिए यह आवश्यक था कि इसकी फाउंडेशन बहुत मजबूत हो। लगभग 3 वर्ष तक लगातार कार्य चलता रहा और इस स्थल पर 20 फीट नीचे और 20 फुट ऊंची अर्थात 40 फीट की एक ऐसी मजबूत फाउंडेशन बनाई गई ताकि उस नींव पर यह भव्य और विशाल मंदिर अपनी भव्यता के साथ निर्मित किया जा सके। मंदिर निर्माण में पत्थर व कंक्रीट का ही उपयोग किया गया है। लोहे का प्रयोग सामान्यतः पचास सौ वर्षों में मंदिर की दीवारों को कमजोर कर देता है जबकि पत्थर व कंक्रीट से निर्मित दीवारें हजारों वर्षों तक ज्यों की त्यों ही रहती हैं। भारत के प्राचीन मंदिर एवं अनेक ऐतिहासिक स्मारक इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

यह संपूर्ण मंदिर श्री मुकेश कुमार कन्हैया जी सोमपुरा के निर्देशन में निर्मित हो रहा है। सोमपुरा परिवार की पिछली अनेक पीढ़ियां सात आठ शताब्दियों से देश के विभिन्न राज्यों में जैन मंदिरों के निर्माण के साथ समर्पित भाव से जुड़ी रहीं हैं। पाली जिले के रहने वाले सोमपुरा ने प्रस्तावित मंदिर निर्माण के वैशिष्ट्य के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि मंदिर की फाउंडेशन 100×150 फीट के क्षेत्र में फैली हुई है। फाउंडेशन तैयार होने के बाद मंदिर निर्माण का पहला पत्थर 23 अप्रैल, 2016 में लगाया गया। इसका लाभ सुराणा परिवार ने लिया। तदोपरांत संस्थागत एवं जन सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य अनवरत जारी है।

रोचक तथ्य

यह मंदिर राजस्थान के सभी मंदिरों में सबसे बड़ा व ऊंचा है। इसके रंग मंडप में 2000 लोगों के एक साथ बैठने की क्षमता है। मूल गंभारे में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की 57 इंच की प्रतिमा है। लगभग 700 – 800 किलो के वजन की यह प्रतिमा बहुत ही सुंदर और मनोहारी है। पूरी प्रतिमा एक ही पाषाण से बनी हुई है। मूलनायक भगवान के साथ के गंभारे में 2 प्रतिमाएं सिमन्दर स्वामी व पार्श्वनाथ भगवान की हैं। ये प्रतिमाएं 41 इंच की हैं। गोखले में 31- 31 इंच की दो प्रतिमाएं प्रतिष्ठित की जाएंगी । रंग मंडप के बाहर छतरी में 21- 21 इंच की 6 देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना होगी।

सोमपुरा के अनुसार प्रतिमाओं के निर्माण में जैन ज्योतिष गणित व नक्षत्रों आदि का पूरा ध्यान रखते हुए उन्हें प्रामाणिक रूप से तैयार किया गया है। इन मूर्तियों का निर्माण जयपुर के सरस्वती मूर्ति भंडार के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मूर्तिकार महेंद्र शर्मा ने किया है।

पूरा मंदिर मेरु प्रसाद नागरादि शैली पर आधारित है । आचार्य मणिप्रभ सागर जी ने बताया कि इस मंदिर का शिल्प जैन शिल्प के विविध रूपों का अनूठा संगम होगा। जैन शिल्प इतिहास के इस दौर में समकालीन शिल्प परंपराओं से प्रभावित हुआ है। किसका अद्भुत समन्वय यहां देखने को मिलेगा। रंग मंडप की इन मूर्तियों के माध्यम से जैन परंपरा और सिद्धांत के अनेक कथानक प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त होंगे।

मकराना के प्रसिद्ध मार्बल व्यवसायी मोहम्मद इकबाल गत 40 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़े हैं। इनके पिताजी जैन मंदिरों के निर्माण से जुड़े रहे किंतु इकबाल भाई का जैन मंदिर निर्माण से यह पहला जुडाव है। मंदिर के लिए सस्ता किंतु गुणवत्तापूर्ण मार्बल उपलब्ध कराने के लिए वह वर्षों से पूरी निष्ठा से जुड़े हैं। उनके अनुसार पूरे मंदिर में लगभग दो लाख घनफुट मार्बल पत्थर लगेगा। मार्बल को तराशने से लेकर उस पर कार्विंग तथा पॉलिश का सारा कार्य उनकी देखरेख में हो रहा है। उड़ीसा के लगभग 60 कलाकार पिछले एक वर्ष से लगातार मंदिर के रंग मंडप में मूर्तियां गढ़ने का कार्य कर रहे हैं। मार्बल के इन अनगढ़ पत्थरों को वे सोनपुरा के निर्देशन में विशिष्ट बारीक कलाकारी के साथ दागिने पहनाते हुए जीवंतता प्रदान कर रहे हैं।

मंदिर निर्माण की मुख्य प्रेरक साध्वीश्री मणिप्रभ जी ने बताया कि कि सोने की अंगूठी में जिस प्रकार हीरा चमकता है उसी प्रकार अध्यात्म की दुनिया में यह मंदिर अपनी विशिष्टता के कारण दुनिया भर में श्रद्धालुओं को आकर्षित करेगा। इसके शिल्प का वही आनंद होगा जो संगीत की सरगम में महसूस होता है।

आचार्य श्री मणिपपप्रभ सागर जी का मानना है कि मंदिर में प्रतिमाएं मूल रूप से पाषाण की होती हैं लेकिन शास्त्रीय विधानों के तहत इन पाषाण मूर्तियों में मंत्र शक्ति के द्वारा प्राणों का संचार किया जाता है।